Rogabhishagjitiya Vimana: Difference between revisions
| Line 58: | Line 58: | ||
<div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | <div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | ||
अथातो रोगभिषग्जितीयंविमानं व्याख्यास्यामः||१|| | |||
इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२|| | |||
<div class="mw-collapsible-content"> | <div class="mw-collapsible-content"> | ||
| Line 75: | Line 77: | ||
<div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | <div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | ||
बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवं कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च विदित्वा युक्तिदर्शनाद्भिषग्बुभूषुः शास्त्रमेवादितः परीक्षेत| | |||
विविधानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके; | |||
तत्र यन्मन्येत सुमहद्यशस्विधीरपुरुषासेवितमर्थबहुलमाप्तजनपूजितं त्रिविधशिष्यबुद्धिहितमपगतपुनरुक्तदोषमार्षंसुप्रणीतसूत्रभाष्यसङ्ग्रहक्रमं स्वाधारमनवपतितशब्दमकष्टशब्दं | |||
पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधानं सङ्गतार्थमसङ्कुलप्रकरणमाशुप्रबोधकं लक्षणवच्चोदाहरणवच्च, | |||
तदभिप्रपद्येत शास्त्रम्| | |||
शास्त्रं ह्येवंविधममल इवादित्यस्तमो विधूयप्रकाशयति सर्वम्||३|| | |||
<div class="mw-collapsible-content"> | <div class="mw-collapsible-content"> | ||
| Line 122: | Line 125: | ||
<div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | <div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | ||
ततोऽनन्तरमाचार्यंपरीक्षेत;तद्यथा- | ततोऽनन्तरमाचार्यंपरीक्षेत; तद्यथा- | ||
पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टकर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृतिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमंशिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थंचेत | पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टकर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृतिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमंशिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थंचेत | ||
| Line 154: | Line 157: | ||
<div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | <div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | ||
तमुपसृत्यारिराधयिषुरुपचरेदग्निवच्च देववच्च राजवच्च पितृवच्च भर्तृवच्चाप्रमत्तः| | |||
ततस्तत्प्रसादात्कृत्स्नं शास्त्रमधिगम्य शास्त्रस्य दृढतायामभिधानस्य | |||
सौष्ठवेऽर्थस्य विज्ञाने वचनशक्तौ च भूयो भूयः प्रयतेत सम्यक्||५|| | |||
<div class="mw-collapsible-content"> | <div class="mw-collapsible-content"> | ||
| Line 174: | Line 177: | ||
तत्रोपायाननुव्याख्यास्यामः- | तत्रोपायाननुव्याख्यास्यामः- | ||
अध्ययनम्,अध्यापनं,तद्विद्यसम्भाषाचेत्युपायाः||६|| | अध्ययनम्, अध्यापनं, तद्विद्यसम्भाषाचेत्युपायाः||६|| | ||
<div class="mw-collapsible-content"> | <div class="mw-collapsible-content"> | ||
| Line 189: | Line 192: | ||
तत्रायमध्ययनविधिः- | तत्रायमध्ययनविधिः- | ||
कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽवश्यकमुपस्पृश्योदकं | |||
देवर्षिगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य | देवर्षिगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो मनःपुरःसराभिर्वाग्भिः सूत्रमनुक्रामन् | ||
पुनः पुनरावर्तयेद्बुद्ध्वा सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारार्थं | |||
परदोषप्रमाणार्थं च; | |||
एवं मध्यन्दिनेऽपराह्णे रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्नध्ययनमभ्यस्येत्| | |||
इत्यध्ययनविधिः||७|| | इत्यध्ययनविधिः||७|| | ||
| Line 286: | Line 289: | ||
<div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | <div class="mw-collapsible mw-collapsed"> | ||
स तथा कुर्यात्||१०|| | |||
<div class="mw-collapsible-content"> | <div class="mw-collapsible-content"> | ||